SONGFABLE · 2016

Nikes

FRANK OCEAN · 2016

TL;DR: ऊपर से "Nikes" महँगे जूतों और दिखावे का गाना लगता है, पर असल में यह मौत, शोक और उन दोस्तों की याद का गाना है जो अब नहीं रहे — Frank Ocean यहाँ चीज़ों की चमक को इसलिए गिनवाता है ताकि वह बता सके कि इनमें से कुछ भी साथ नहीं जाता।
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जूते सिर्फ़ बहाना हैं

चार साल की चुप्पी के बाद जब Frank Ocean लौटा, तो उसने अपने नए एल्बम की शुरुआत एक ऐसी आवाज़ से की जो उसकी अपनी आवाज़ ही नहीं लगती। "Nikes" की पहली आधी दूरी में उसका स्वर इतना ऊँचा कर दिया गया है कि वह किसी खिलौने या किसी दूसरी दुनिया के प्राणी जैसा सुनाई देता है। बहुत से श्रोताओं ने पहली बार सुनकर सोचा कि शायद उनकी स्ट्रीमिंग ऐप में कोई गड़बड़ी है। पर यह गड़बड़ी नहीं थी — यह डिज़ाइन था।

और उस अजीब, चमकीली, नशीली आवाज़ में जो बातें कही जाती हैं, वे भी शुरुआत में सतही लगती हैं: ब्रांडेड जूते, पैसा, पार्टियाँ, ऐसे लोग जो प्यार से ज़्यादा चीज़ों में दिलचस्पी रखते हैं। पर गाने के भीतर, इसी चमक के बीच, Frank अचानक उन नामों को छू लेता है जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। एक साथी कलाकार जिसकी युवावस्था में मौत हो गई, एक दक्षिणी रैप की महान हस्ती जो नशे की चपेट में चली गई, और एक किशोर जिसकी हत्या ने पूरे अमेरिका को हिला दिया था।

यही "Nikes" का असली झटका है। यह उपभोक्तावाद पर व्यंग्य भी है और शोक-गीत भी। जूते यहाँ जूते नहीं हैं — वे उस पूरी दौड़ का प्रतीक हैं जिसमें हम सब भागते हैं, यह जानते हुए भी कि रेखा के दूसरी तरफ़ कोई इनाम नहीं रखा है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि Nike नाम ख़ुद ग्रीक मिथक की विजय-देवी से आया है। यानी गाने का शीर्षक ही "जीत" का नाम लेकर पूछता है — किस चीज़ की जीत, और किसकी कीमत पर?

चार साल की चुप्पी, और एक बहुत सोची-समझी वापसी

समझने के लिए 2016 के माहौल में लौटना ज़रूरी है। Frank Ocean ने 2012 में channel ORANGE से दुनिया को चौंकाया था — एक ऐसा R&B एल्बम जो प्रेम, वर्ग और पहचान की बात इतनी नाज़ुकी से करता था कि उसे तुरंत आधुनिक क्लासिक मान लिया गया। इसके बाद वह लगभग गायब हो गया। साक्षात्कार नहीं, सोशल मीडिया पर लगभग सन्नाटा, बस बीच-बीच में अफ़वाहें और टाली गई रिलीज़ की तारीख़ें। प्रशंसकों के लिए वे चार साल एक तरह की परीक्षा बन गए थे — इंटरनेट पर "Frank Ocean कब आएगा" एक चलता-फिरता मज़ाक बन चुका था।

फिर अगस्त 2016 में सब कुछ एक साथ हुआ। पहले एक विज़ुअल प्रोजेक्ट सामने आया जिसमें Frank एक गोदाम में सीढ़ी बनाता दिखता है, और उसके तुरंत बाद असली एल्बम — जिसका नाम कवर पर एक तरह से लिखा है और स्ट्रीमिंग सेवाओं पर दूसरी तरह से। यही दोहरापन पूरे एल्बम का स्वभाव है, और "Nikes" उसका पहला दरवाज़ा। कहा जाता है कि इस रिलीज़ की जटिल संरचना Frank को अपने पुराने रिकॉर्ड कंपनी अनुबंध से आज़ाद होने में मदद देने के लिए थी — यानी गाने की आज़ादी की भावना केवल बोलों में नहीं, उसके कारोबारी ढाँचे में भी बुनी हुई थी।

गाने के साथ आया वीडियो भी उतना ही चर्चित हुआ — ग्लिटर, धीमी गति, धुंधली रोशनी, और वह अजीब सी स्वप्निल बनावट जो जागने और सोने के बीच कहीं तैरती है। गाने का वीडियो संस्करण और एल्बम संस्करण भी पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं, जो इस बात का एक और संकेत है कि Frank अपने काम को "अंतिम रूप" देने में यक़ीन नहीं रखता — वह उसे बहता हुआ छोड़ देता है।

भारतीय श्रोताओं के लिए इसमें एक बहुत जानी-पहचानी गूँज है। एक तरफ़ पिछले कुछ वर्षों में भारत के महानगरों में स्नीकर संस्कृति तेज़ी से बढ़ी है — सीमित संस्करण के जूतों के लिए लगने वाली कतारें, रीसेल बाज़ार, और "क्या पहना है" से तय होती सामाजिक हैसियत। दूसरी तरफ़, हमारी अपनी परंपरा में सदियों से यही सवाल दोहराया जाता रहा है कि संग्रह की गई चीज़ें अंततः किसी के साथ नहीं जातीं। "Nikes" इन दो दुनियाओं के ठीक बीच खड़ा है — यह न तो उपदेश देता है, न त्याग की माँग करता है। यह बस चीज़ों की सूची पढ़ता है और फिर बीच में एक नाम ले लेता है जो अब जीवित नहीं। बाकी काम श्रोता के दिमाग़ में अपने-आप हो जाता है।

बोल क्या कहते हैं — चमक की परत के नीचे

गाने को तीन परतों में खोला जा सकता है।

पहली परत: दिखावे का व्यंग्य। शुरुआत में Frank उस दुनिया की भाषा बोलता है जिसकी वह आलोचना कर रहा है। यहाँ रिश्ते लेन-देन जैसे लगते हैं — कोई किसी के साथ इसलिए है क्योंकि उससे कुछ मिलता है, और तोहफ़े स्नेह की जगह ले चुके हैं। ब्रांडेड जूतों का ज़िक्र इस पूरे रवैये का शॉर्टहैंड है: वह चीज़ जो आप पहनते नहीं, बल्कि जिससे आप दूसरों को बताते हैं कि आप कौन हैं। और वह ऊँची की गई आवाज़ इस परत को और तीखा बना देती है, क्योंकि वह असली नहीं लगती — जैसे कोई गुड़िया या कोई नशे में डूबा हुआ अवतार यह सब बोल रहा हो। कई सुनने वालों ने इसे Frank का "alter ego" माना है, यानी वह हिस्सा जो भौतिक दुनिया की भाषा बोलता है।

दूसरी परत: शोक। फिर, बिना किसी चेतावनी के, वही आवाज़ मरे हुए लोगों का ज़िक्र कर देती है। एक युवा संगीत-उद्यमी जिसकी 2015 में मौत हुई और जो हिप-हॉप की एक पूरी पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक था। दक्षिण अमेरिका के रैप दृश्य का एक दिग्गज जिसकी मौत सिरप के दुरुपयोग से जुड़ी बताई जाती है। और सबसे मार्मिक — एक काला किशोर जिसकी 2012 में हुई हत्या ने अमेरिका में नस्ल और सुरक्षा की पूरी बहस को दोबारा खोल दिया। Frank उस लड़के के बारे में कुछ ऐसा कहता है जो बेहद निजी है: कि वह उसके जैसा दिख सकता था, यानी वही ख़तरा उसका भी हो सकता था। एक ही पंक्ति में गाना उपभोग की सूची से निकलकर मृत्यु-दर की बात करने लगता है।

तीसरी परत: असली आवाज़। गाने के आख़िरी हिस्से में पिच धीरे-धीरे उतरती है और Frank की अपनी, नरम, थकी हुई आवाज़ सामने आती है। यहाँ का स्वर एकदम बदल जाता है — व्यंग्य की जगह कमज़ोरी आ जाती है। वह किसी एक व्यक्ति से बात कर रहा है, ऐसा लगता है, और वह वादा या यक़ीन दिलाने की कोशिश कर रहा है। पर वह जो कहता है, वह भी आसान नहीं — उसमें ईर्ष्या है, अकेलापन है, और यह स्वीकार भी कि रिश्ते कभी साफ़-सुथरे नहीं होते। यह हिस्सा एल्बम के बाकी हिस्सों का दरवाज़ा खोल देता है, जहाँ Frank बार-बार याददाश्त, नशे और अधूरी मोहब्बत के बीच झूलता रहता है।

इन तीनों परतों को जोड़ने वाला सूत्र यही है: चीज़ें बची रहती हैं, लोग नहीं। जूते अलमारी में रह जाते हैं, दोस्त चले जाते हैं। और जो आवाज़ शुरू में मज़ाक उड़ाती लगती है, वह अंत तक आते-आते सबसे ईमानदार आवाज़ बन जाती है।

संस्कृति में इसकी जगह

"Nikes" का असर संगीत के तकनीकी स्तर पर भी पड़ा। पिच बदलकर आवाज़ को अपरिचित बना देना कोई नई तरकीब नहीं थी — सोल के नमूनों को तेज़ करके इस्तेमाल करने की परंपरा 2000 के दशक के हिप-हॉप में मशहूर रही है, और भारतीय फ़िल्म संगीत में भी पिच के साथ खेलने के अपने लंबे प्रयोग रहे हैं। पर Frank ने इसे किसी नमूने पर नहीं, अपनी ही मुख्य गायकी पर लागू किया, और वह भी एक बहुत भावुक गाने में। इसके बाद के वर्षों में कई युवा कलाकारों ने आवाज़ को "मानवीय" रखने की बाध्यता छोड़ दी — पिच, फ़ॉर्मेंट और प्रोसेसिंग अब भावना व्यक्त करने का माध्यम बन गए, छिपाने का नहीं।

एल्बम के बाकी हिस्से की तरह "Nikes" भी उस दौर के R&B के ढाँचे को तोड़ता है। यहाँ ड्रम बहुत कम हैं, कोरस का ढाँचा साफ़ नहीं है, और गाना अपनी मर्ज़ी से आकार बदलता रहता है। Blonde को आलोचकों ने दशक के सबसे प्रभावशाली एल्बमों में गिना, और शुरुआती ट्रैक होने के नाते "Nikes" ही वह जगह है जहाँ श्रोता को बताया जाता है कि यहाँ के नियम अलग हैं। कहा जाता है कि इसी वजह से पहली बार सुनने पर बहुत से लोगों को एल्बम अधूरा या ठंडा लगा, और तीसरी-चौथी बार सुनने पर वही चीज़ें उन्हें सबसे प्यारी लगने लगीं।

गाने का सामाजिक पहलू भी उतना ही अहम रहा। 2016 वह साल था जब अमेरिका में नस्लीय हिंसा और पुलिस बर्बरता को लेकर आंदोलन अपने चरम पर था। एक ऐसे गाने में, जो सतह पर फ़ैशन और नशे की बात कर रहा है, उस किशोर का नाम ले आना एक राजनीतिक कदम था — पर बिना नारे के, बिना गुस्से के प्रदर्शन के। यही Frank की शैली है: वह चीख़ता नहीं, वह बस चीज़ों को एक-दूसरे के बगल में रख देता है, और उनका टकराव अपने-आप अर्थ पैदा कर देता है।

आज भी यह क्यों गूँजता है

आज, जब हमारी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा एक स्क्रीन पर दिखाई जाने वाली छवि बन चुका है, "Nikes" पहले से ज़्यादा सटीक लगता है। सीमित संस्करण के जूते, नई गाड़ी, विदेश की तस्वीरें — भारत के महानगरों में भी यह भाषा अब पूरी तरह घर कर चुकी है। युवाओं पर "सफल दिखने" का दबाव उतना ही असली है जितना अमेरिका में। और उसी के साथ चलता है वह खालीपन जिसकी बात Frank करता है: आप सब कुछ इकट्ठा कर लेते हैं और फिर भी किसी को फ़ोन करके यह नहीं कह पाते कि आप अकेले हैं।

दूसरी वजह और गहरी है। यह गाना शोक को उस जगह रखता है जहाँ हम आमतौर पर उसे नहीं रखते — पार्टी के बीच में, चमक के बीच में। असल ज़िंदगी में दुःख भी ऐसे ही आता है: किसी सामान्य दिन के बीच में, किसी हँसी के बीच में, अचानक किसी का नाम याद आ जाता है जो अब नहीं है। "Nikes" उस अनुभव को बहुत ईमानदारी से पकड़ता है। भारतीय संदर्भ में, जहाँ शोक अक्सर सामूहिक और औपचारिक होता है, यह गाना उसका उलटा दिखाता है — अकेले, धीमे, बिना किसी को बताए किया गया शोक।

और आख़िर में, वह आवाज़। शुरुआत में जो कृत्रिमता चौंकाती है, बार-बार सुनने पर वही सबसे मार्मिक लगने लगती है — क्योंकि हम सब किसी न किसी रूप में अपनी आवाज़ बदलकर दुनिया से बात करते हैं। दफ़्तर में एक स्वर, परिवार में दूसरा, इंटरनेट पर तीसरा। "Nikes" उस मुखौटे को पहनता है, उसे टिकाए रखता है, और फिर आख़िरी हिस्से में उसे उतार देता है। वह उतरना ही इस गाने का असली भावनात्मक क्षण है, और यही वजह है कि एक दशक बाद भी लोग इसे लूप पर सुनते हैं — जूतों के लिए नहीं, उस पल के लिए जब आवाज़ इंसानी हो जाती है।


गहराई में डूबने के तरीके

🎧 आवाज़ में डूब जाइए

📚 कहानी का पीछा कीजिए

🌍 उन जगहों की सैर कीजिए

🎸 खुद अनुभव कीजिए


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